शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

शिरडी वाले साई बाबा:" साई नाथ तेरे हजारों हाथ..."



    जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो,आज हम एक बार फिर उपस्थित हैं आप की सेवा में अपने वचन के अनुसार | कई दिनों से जो बात करने की चर्चा कर रहे थे,अब वह बात करने का समय भी आ गया है | हम ने कहा था कि हम आप से उस अप्रतिम विभूति की चर्चा करेंगे,जिस ने असंख्य लोगों का जीवन ही बदल कर रख दिया | इस आलेख के शीर्षक से ही आप समझ गये होंगे की हम किन की बात कर रहे हैं ? जी हाँ,हम आज आप से बात करने जा रहे हैं 'शिरडी वाले साई बाबा' की | जिन के दिये दो मूल मन्त्रों---'श्रद्धा' (विश्वास) और 'सबूरी' (धीरज)---के सहारे न जाने कितने लोगों का जीवन शक्तिमय है | बाबा को किसी प्रकार की चर्चा में सीमित कर पाना हमारी क्षमताओं से सर्वथा बाहर की बात थी | ऐसा कर पाने के लिए हम ने उन्हीं से अनुमति ली | यह हमारा सौभाग्य है कि हमें उन की अनुमति मिली | इस से भी बढ़ कर हम तो यह कहेंगे कि इस आलेख के लिए हमें उन का ही आदेश मिला है | हम जो अब यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं,यह उन्हीं की प्रेरणा से हो रही है | तो आइए,साई नाथ का नाम ले कर आरम्भ करते हैं यह पावन चर्चा |
     जन्म-दिनांक सम्बन्धी विभिन्न मत 
      बाबा की जन्म-दिनांक को ले कर विभिन्न मत प्रचलित हैं | हमें बाबा की तीन जन्म-दिनांक मिलीं | एक थी 18-05-1837,रात्रि 08 बजे,ग्राम-पथरी,महाराष्ट्र | दूसरी थी 28-09-1835 | तीसरी थी 27-09-1838,आन्ध्र प्रदेश | हम कई दिनों तक तो इस जन्म-दिनांक-पहेली को हल नहीं कर पाये | फिर उसी युक्ति को काम लिया | कौनसी ? अरे वही,'तेरा तुझ को अर्पण' वाली | हम ने यह दायित्व बाबा पर ही छोड़ दिया कि वे स्वयं बताएँ कि उन की सही जन्म-दिनांक क्या है ? इस के बाद फिर उन्हीं की कृपा से हमें सही जन्म-दिनांक मिली | हाँ,दिनांक ही,जन्म-स्थान नहीं | हम ने बाबा की जन्म-दिनांक के रूप में 27-09-1838 को पाया | फिर जब अंक ज्योतिषीय विश्लेषण की कसौटियों पर कसा तो वहाँ भी इसे खरा पाया | अभी यहाँ 'जन्मांक-नामांक विश्लेषण' में आप स्वयं इस बात के साक्षी बनेंगे | हाँ,इस जन्म-दिनांक के साथ जुड़े स्थान (आन्ध्र प्रदेश ) से हम सहमत नहीं हैं | 
      जन्मांक-नामांक विश्लेषण 
       बाबा का जन्म 27-09-1838 को हुआ | इस का मूलांक-9,मासांक-9,वर्षांक-2 और भाग्यांक भी 2 हुआ | चलित का अंक 6 (ऋणात्मक) था | बाबा की सूर्य राशि 'तुला' ठहरी | जन्म का मूलांक 27 रचनात्मकता का प्रतीक है | यह उच्च सम्मान की प्राप्ति करवाता है | जन्म का वर्षं 20 जागरण,न्याय-प्रियता व योजनाओं में सफलता पाने का अंक है | इतना अवश्य है की यह सफलता देरी से मिलती है | ऐसे लोगों की उपमा एक देवदूत से दी जाती है | चूँकि यह अंक बाबा का भाग्यांक भी है,इस लिए इस के फल का प्रभाव दोहरा हो जाता है | यहाँ देखिये बाबा के जन्म के मूलांक में बैठे दोनों अंक (2 व 7) सहोदर हैं | ये स्त्री अंक कहलाते हैं | ये अंक माता,पत्नी,परिवार,बहन व विश्वास के हैं | बाबा के यहाँ ये अंक सशक्त अवस्था में तो हैं,किन्तु यह अवस्था विखंडित है,क्यों कि इन का जन्म अंक 6 के ऋणात्मक समय में हुआ है | अंक 6 यानि शुक्र यानि सुख | इन के साथ बाबा के भाग्यांक 2 की युति भी विश्लेषित की जाए तो इस अवस्था का विषैलापन बढ़ जाता है | इस सशक्तावस्था के कारण ही बाबा के जीवन में माता,पत्नी,परिवार,बहन और पारिवारिक दायरे में विश्वास का सर्वथा अभाव रहा | इन्हें माता का सुख बिलकुल नहीं मिला | बहन का सुख भी कहाँ मिला ? पिता ने तो जन्म से पहले ही छोड़ दिया था | तो ऐसे में भला परिवार का सुख कहाँ रहा ? इसी प्रबल शुक्र विखंडनावस्था के कारण ही बाबा को स्त्री सुख यानि पत्नी का सुख नहीं मिला | उन्होंने विवाह नहीं किया | अंक 6 की यह अवस्था उन की बॉडी लैंग्वेज में भी साफ़ दिखाई पड़ती है | उन का शरीर विखंडित व विमंदित शुक्र वाला था | 'था' का मतलब अब उन का शरीर नहीं है,वे तो सदा सर्वदा अपने भक्तों के साथ हैं ही | अब देखिए कमाल इन स्त्री अंकों (2 व 7) की इस सशक्त विखंडनावस्था का | ये अंक अपना ऋणात्मक फल देते हैं,मगर पारिवारिक दायरे में ही | परिवार से बाहर यही अवस्था धनात्मक फल देती है | इसी लिए साई बाबा को अन्य स्त्रियों का अपार स्नेह मिला,भले ही वह वायजा बाई हो या कोई और | इस के अलावा उन्हें अपने मुरीदों का एक अनंत परिवार भी मिला | इस श्रद्धा और स्नेह के आगे तो परिवार का स्नेह फीका पड़ जाता है | बाबा के जन्म का मूलांक 9 और भी बहुत कुछ बताता है | अंक 2,7 व 9 का यह त्रिकोण स्त्रीत्व प्रधानता से धर्म व अध्यात्म के प्रसार को भी इंगित करता है,किन्तु यह प्रसार सामाजिकता प्रधान होता है | इसी लिए बाबा का सारा ज़ोर सामाजिकता व मानवता पर ही है | 
             बाबा का जन्म गुरुवार को हुआ | इस का अंक है-3 | बाबा के 'साई बाबा' नाम के अंक बनाते हैं-१० | इसे 'सौभाग्य का चक्र' भी कहते हैं | यह आत्मविश्वास,निष्ठा व सम्मान का प्रतीक है | ऐसे लोगों के जीवन में उतर-चढ़ाव बहुत आते हैं | बाबा का तो समस्त जीवन इस बात का साक्षी है | इस नामांक को भाग्यांक में जोड़ दिया जाए तो अंक 3 उन का संयुक्तांक भी ठहरता है | बाबा का समस्त जीवन अंक 3 की प्रधानता वाला है | यह अंक प्रवचन,उपदेश,मार्गदर्शन,गुरु,ज्ञान आदि का है | 'साई' का तो अर्थ ही 'ज्ञान-संपन्न' होता है | अपने भाग्यांक 2 की अंक 3 से प्रच्छन्न युति के कारण ही बाबा औपचारिक स्वरूप में किसी पीठ या गद्दी पर आसीन हो कर प्रवचन नहीं करते थे | यह युति व्यास-पीठ-नुमा प्रवचनकर्ता नहीं बनने देती है | इन का बचपन का नाम 'बाबू' था | इस का अंक बनता है-11,जिस का प्रतीकार्थ यह है कि ऐसे लोगों को अन्य लोगों से भय रहता है | इन्हें दूसरों से धोखा मिलता है | इन के मार्ग में कई कठिनाइयाँ आती हैं |  इस नामांक का मूलांक बनता है-2 | यह अंक जन्म के अंकों के साथ मिल कर पूर्व में उल्लेखित स्त्री अंकों के दोष को बढ़ाता  है | इस लिए जब तक बाबा का नाम 'बाबू' चला,वे बहुत दुखी और परेशान रहे | जब से उन का नाम 'साई बाबा' पड़ा,तब से उन के जीवन की समूची दशा ही बदल गयी | यह है नाम की महिमा | 
          बाबा की अंक कुण्डली
           अब बात करते हैं बाबा की जन्म की अंक कुंडली की | यहाँ हम सब से पहले चर्चा करेंगे 'पितृद्रोह युति' यानि 'GODFTHER PROBLEM ' की | यह दो प्रकार की होती है---(1) उच्चस्थ,और (2) निम्नस्थ | (1) उच्चस्थ:---इस का तात्पर्य यह है कि जातक को अपने पिता,पिता-समक्ष,संरक्षक,गुरु या ख़ैर-ख्वाह का सुख नहीं मिलता है | (2) निम्नस्थ:---जातक स्वयं जिन का पितृ-परुष यानि पिता,पिता-समकक्ष,गुरु,संरक्षक या ख़ैर-ख्वाह होता है,उन के कारण उसे दुःख उठाना पड़ता है | यह 'पितृद्रोहात्मक युति' जितनी प्रबल होती है,यह सुख उतना ही कम मिलता है | अभी पहले हम बाबा के यहाँ इस युति की उच्चस्थ अवस्था का विश्लेषण करते हैं ,निम्नस्थ अवस्था का विश्लेषण उन के देहांत के अंकों के विश्लेषण के समय करेंगे | बाबा की अंक कुंडली में अंक 1 के साथ दोहरी भूमिका में अंक 8 बैठा है | इस से पितृद्रोह की अवस्था बहुत प्रबल हो गयी है | यह बात इन के जीवन-वृत्त की घटनाओं से भी सिद्ध होती है | इस का सब से पहला प्रभाव दिखता है कि इन के पिता श्री गंगा भावडिया इन्हें इन के जन्म से पहले ही (गृह-त्याग के रूप में) छोड़ कर चले गये थे | तो इन्हें पिता का सुख कहाँ मिला ? फिर जिस मुस्लिम परिवार ने इन्हें अपनाया,उस का मुखिया भी इन्हें अपनाने के मात्र चार साल बाद ही चल बसा | हुआ भी क्या था उसे ? दो-चार दिन बस मामूली बुख़ार | तो बाबा को यहाँ भी पितृ-सुख नहीं मिला | इस के बाद पालनहारी मुस्लिम माँ ने वेकुशा महाराज (कुछ मतों के अनुसार बैकुंठ महाराज) के आश्रम में डाल दिया | मगर यह सुख भी बाबा के भाग्य में अधिक कहाँ लिखा था ? मात्र 12 वर्षों के बाद ही ये महाराज भी स्वर्ग सिधार गये | अब यह बालक ( हमारे साई बाबा ) पूर्णतः पितृ-विहीन हो गये | तो ऐसा होता है कुण्डली की इस 'पितृद्रोह युति' का फल | ठीक ऐसा ही गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ भी हुआ था | मित्रो,हम ने जो आप से निवेदन किया था न कि बाबा की यह जन्म-दिनांक हमें सही लग रही है,तो उस का कारण भी यहाँ हम ने बता दिया है | अब आप स्वयं ही देखिए कि बाबा के अब तक के इस जीवन-वृत्त से क्या ऐसा सिद्ध नहीं हो रहा है ? इस लिए ही तो बाबा ने स्वयं हमें अपनी सही जन्म-दिनांक की प्रेरणा दी या बतायी 
              वैसे तो मित्रो,बाबा का जीवन अपार घटनाक्रम-भरा रहा | उन की किस घटना की बात करें और किसे छोड़ें ? मगर कुछ बातों को ज्योतिषीय विश्लेषण की दृष्टि से आवश्यक समझ कर ले रहे हैं,जिस से कि आप अंक ज्योतिष के दायरे में रोचक ढंग से इस विश्लेषण को समझ सकें | अंक ज्योतिष में अंक 3,6 व 9 का समूह 'सर्वश्रेष्ठ' कहलाता है | बाबा के जीवन पर इस अंक-समूह का सघन प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | अंक 3 के कुछ प्रभाव की बात तो हम पूर्व में कर ही चुके हैं | अब इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं | बाबा वेकुशा महाराज के आश्रम में १२ वर्ष रहे | इस का अंक बनता है-3 | यह समयावधि थी वर्ष 1842 से वर्ष 1854 | 1842 का अंक बनता है-6 और 1854 का अंक बनता है-9 | वर्ष 1854 में ये शिरडी पहुँचे,मगर दो महीनों के बाद ही चुपचाप निकल पड़े | दुबारा ये शिरडी पहुँचे 3 साल बाद वर्ष 1857 में | इस वर्ष का अंक बनता है-3 | इस वर्ष ने भारतीय समाज का हुलिया ही बदल कर रख दिया | ईश्वर की असीम अनुकम्पा से इधर साई बाबा ने शिरडी में अलख जगाना शुरू किया, और उधर पराधीन भारत ने अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी का अलख जगाना | क्या इन दोनों बातों का एक साथ होना मात्र एक संयोग था ? नहीं,इस के पीछे प्रभु का कोई विशिष्ट मंतव्य अवश्य था |         
             देहांत 
           बाबा का देहांत हुआ 15-10-1918 को | हम ने यहाँ 'देहांत' शब्द प्रयुक्त किया है,'निधन' नहीं | कारण बहुत स्पष्ट है | 'निधन' का अर्थ है 'नाश','मरण' व मृत्यु' | बाबा का ना तो 'नाश' हुआ,ना ही 'मरण' और ना ही 'मृत्यु' | उन का तो बस,'देहांत' हुआ था | हमारी नज़रों के आगे से उन की देह विलुप्त हो गयी | बाबा तो हैं ही | तो उन के देहांत की दिनांक का मूलांक बनता है-6 | इस का मासांक-1,वर्षांक-भी 1 और भाग्यांक बनता है-8 | हम ने बाबा के जन्मंकों का विश्लेषण करते समय शुक्र की जिस सशक्त विखंडनावस्था का उल्लेख किया था,वह यहाँ भी सिद्ध होती है | देहांत के मूलांक 6 और भाग्यांक 8 की पारस्परिक युति शुक्र को विखंडित कर देती है | बाबा के देहांत का चलित था-अंक 6 (ऋणात्मक) | तनिक ध्यान दीजिए,यह वही चलित है जो कि उन के जन्म का है;यानि बाबा के जन्म और देहांत का चलित समय एक ही है | क्या अद्भुत संयोग है !!! बाबा का देहांत मंगलवार को हुआ था,जिस का अंक है-9 | उन के देहांत का समय था 02 बज कर 30 मिनट यानि कि तब 02 बज कर 31 वाँ मिनट चल रहा था | इन का अंक बनता है-6 | बाबा को तब आयु का 81 वाँ वर्ष चल रहा था | इस का अंक बनता है-9 | बाबा के यहाँ जिस 'पितृद्रोह युति' या 'GODFATHER PROBLEM ' की निम्नस्थ अवस्था का हम ने यहाँ पूर्व में उल्लेख किया है, वह देहांत के इन अंकों से होती है | बाबा का आयु अंक इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है | 81 वें वर्ष में अंक 1 व 8 में यही युति बन रही है | कहा भी जाता है कि बाबा ने अपने एक भक्त की बीमारी अपने पर ले ली थी,और उसी बीमारी के कारण वे चल बसे;यानि कि वे जिस के पितृ-पुरुष थे,उस के कारण उन का यह सुख नष्ट हो गया | देहांत की दिनांक के अंकों की व्याख्या करें तो देहांत का मूलांक 15 मन्त्र,जादू व रहस्य से सम्बन्धित है | बाबा के देहांत के बाद भी उन का जादू यानि चमत्कार जारी है,'साई' नाम अपने-आप में सब से विलक्षण मन्त्र की भूमिका निभा ही रहा है | रहा सवाल रहस्य का,तो बाबा के चमत्कारों और उन की कृपा का रहस्य भला समझ ही कौन सका है ? जब तक बाबा की स्वयं की ही अहैतुकी कृपा न हो,तब तक भला उसे समझा भी कैसे जा सकता है ? बाबा के देहांत के वर्ष का संयुक्तांक है-19 | यह सूर्य का प्रतीक है | ऐसे व्यक्ति की सभी योजनाएँ  सफल होती हैं | ऐसे व्यक्ति को अपार आदर-सम्मान व सफलता मिलती है | 
              तीसरा जन्म कब ? 
               मित्रो,आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि साई बाबा के पुनर्जन्म के क्रम में हम दूसरे जन्म की बजाय यह तीसरे जन्म का जिक्र क्यों कर रहे हैं ? इस बात से तनिक भी आश्चर्य-चकित मत होइए,क्यों कि बाबा का दूसरा जन्म तो आज से लगभग चौरासी साल पहले हो चुका है | इस बारे में हम अगले आलेख में विस्तार से चर्चा करेंगे | आप ही बताइए कि जब दूसरा जन्म हो चुका है तो हम तीसरे जन्म के बारे में ही तो बात करेंगे न | बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 2 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1838 में | बाबा का दूसरा जन्म हुआ अंक 9 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1926 में | 'पुनर्क्रम निर्धारण विधि' से बाबा का अगला जन्म अब फिर से अंक 2 के ही वर्ष में होना है | अब प्रश्न उठता है कि यह वर्ष कौनसा होगा ? तो यह जानने के लिए बाबा के पहले जन्म के अंकों की शरण में चलते हैं | बाबा के पहले जन्म के मूलांक का वृहदंक है-27 व वर्ष का वृहदंक है-20 | इस युति को पहले तो सीधे-सीधे देखें तो यह वर्ष बनता है-2720,जो कि दूसरे जन्म की वर्तमान अवस्था को दृष्टिगत रखते हुए संभव नहीं है,क्यों कि दैहिक धर्म की भी अपनी सीमा होती है | बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की वर्तमान अवस्था लगभग चौरासी साल है,और वर्ष 2720 से कुछ वर्ष पहले भी इस की पूर्णाहुति मान ली जाए,तब भी यह देह-यात्रा लगभग 800 वर्ष की हो जाएगी,जो कि दैहिक धर्म के अनुकूल नहीं बैठ रही है | अब बात करते हैं दूसरे विकल्प की | दूसरा विकल्प यह है कि जन्म के वर्ष और मूलांक के संयुक्तांक की 'विरुद्ध युति' बना ली जाए | यह युति बनती है-वर्ष 2027 | बाबा के पहले जन्म के पहले जन्म के अंकों से ये दो ही विकल्प बनते हैं | इस प्रकार बाबा के तीसरे जन्म का वर्ष ठहरता है-2027 |
    एक और विधि भी है | जन्म के कारक अंक होते हैं-1 व 2 | अंक 1 पुरुष व अंक 2 स्त्री का होता है | इन के मेल से अंक 3 का जन्म होता है | इस बात को सांसारिक या दैहिक स्तर पर इस प्रकार समझिए कि पुरुष व स्त्री के मेल से संतान पैदा होती है | तब अंक 1 पिता व अंक 2 माता का हो जाता है | उन के देहांत का भाग्यांक है-8 | उन के देहांत के वर्ष 1918 में इस अंक 8 को जोड़ देने से बाबा के अगले यानि दूसरे जन्म का वर्ष प्राप्त होता है-1926 | बाबा के पहले जन्म की आयु थी-81 वाँ वर्ष | इस में जन्म के कारक संयुक्तांक 12 को जोड़ दें तो आती है-संख्या 93 | यह बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की आयु  है | इस का तात्पर्य यह हुआ कि बाबा के दूसरे जन्म का देहांत होगा वर्ष 2019 में | अब इस में देहांत के कारक अंक 8 को जोड़ दिया जाए तो बाबा के अगले यानि तीसरे जन्म का वर्ष मिल जाता है | यह मिलता है-वर्ष 2027 | अब तनिक यह भी देख लिया जाए कि वर्ष 2027 में किस समय में बाबा फिर से अवतरित होंगे ? बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 6 ( ऋणात्मक) में | उन का दूसरा जन्म हुआ अंक 3 (ऋणात्मक) में | अंक 3,6 व 9 के समूह का अब शेष रहा अंक है-9 | अब इसी का क्रम है | अंक 9 एक कैलेण्डर वर्ष में दो बार आता है | 21 मार्च से 20 अप्रेल (धनात्मक) और 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर (ऋणात्मक) | इस में भी 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाली अवधि अधिक जमती है,क्यों कि पहली बात तो यह कि इस में चलित की ऋणात्मकता की क्रमबद्धता जारी रहती है,दूसरी बात यह कि बाबा के पहले जन्म के देहांत के 9 वें वर्ष में दूसरा जन्म हुआ | अब तीसरे जन्म के वर्ष 2027 में इस परिधि में तो 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाला समय ही आ रहा है | इस में यदि संक्रमण काल के सात दिन सम्मिलित कर लिये जाएँ तो यह अवधि बढ़ कर 27 नवम्बर तक हो जाती है | उस दिनांक को गुरुवार,मंगलवार या शुक्रवार हो सकता है | इस नाते अक्टूबर महीने की 21 और नवम्बर महीने की 5,9,11,18 व 23 तारीख़ मिलती है | फिर भी मोटे तौर पर यह वर्ष 2027 ठहरता है | अब वास्तव में बाबा का जन्म किस दिन व दिनांक को होगा,यह तो स्वयं बाबा ही जानते हैं,हम ने तो बस अपनी तुच्छ बुद्धि से तनिक गणित लगा कर यह जानने का बस एक विनम्र प्रयास भर किया है | बाबा हमें इस धृष्टता के लिए अवश्य ही क्षमा कर रहे होंगे |                                                                                                                                                     
             तो मित्रो,हम ने आप की सेवा में साई बाबा के जीवन व आगामी संभाव्य को अंक ज्योतिषीय दृष्टिकोण से रखने का यह प्रयास किया है | अपनी तुच्छ क्षमता से जो भी बन सकता था,हम ने वह करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश की है | इस में रही त्रुटियों के लिए हम सर्वप्रथम तो बाबा से और फिर आप से क्षमा माँगते हैं | बाबा हमें और अधिक सक्षम बनाएँ,जिससे हम अधिक सक्षम हो कर अपनी गणनाएँ कर सकें | आज के लिए बस इतना ही | हाँ,अगले आलेख में हम बात करेंगे बाबा के दूसरे जन्म के बारे में |  ......... अब आज के आनंद की जय | जय साई नाथ | ............ जय श्री राम |