शनिवार, 6 मार्च 2010

हम आप की सेवा में:एक नाटककार के रूप में

                          जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो,हम ने भानपुरा ज्योतिष सम्मेलन कि बात करते वक़्त और कल भी यह कहा था कि आप से एक बहुत ही ख़ास और हट कर बात करनी है | तो आज हम वही बात करने उपस्थित हैं | वैसे तो हमारे ये ब्लॉग ज्योतिष को ही समर्पित हैं | हमारा इरादा तो यही था ( और है भी ) कि यहाँ सिर्फ़ ज्योतिषीय चर्चा ही करेंगे,मगर पिछले दिनों हुई एक बात ने इस लीक से हटने पर विवश कर दिया है | पिछले दिनों हमारे लघु नाटक 'मामेकं शरणं व्रज' को जवाहर कला केंद्र,जयपुर की ओर से आयोजित 'प्रदेश-स्तरीय लघु नाट्य-लेखन प्रतियोगिता' में प्रौढ़ वर्ग में तृतीय पुरस्कार मिला | हमारे नाटक को ज.क.केंद्र की ओर से लगातार 10 वें वर्ष पुरस्कृत किया गया | बात तो सिर्फ़ इतनी-सी थी | मगर हमारे कुछ शुभचिंतकों ( जो कि हमारे नाटककार और रंगकर्मी के रूप से बहुत परिचित हैं ) का कहना था कि हमें यह जानकारी आप के साथ बाँटनी चाहिए | सिर्फ़ यही नहीं,अपितु अपने नाट्यकर्म को भी आप से तनिक परिचित करवाया जाना चाहिए | हमें भी यह सुझाव अच्छा लगा | अब हमारे पास इन बातों के लिए कोई और ब्लॉग तो है नहीं | इस लिए क्यों न ये बातें यहीं कर ली जाएँ | हालांकि यह सारी चर्चा हम संक्षिप्त रूप में ही करेंगे |
                         मित्रो,वैसे तो अक्टूबर,1984 में स्कूल के वक़्त एक एकल आशु नाट्य-प्रस्तुति से हमारी नाट्य-यात्रा का आरम्भ माना जा सकता है | इस के बाद 10 फरवरी,1990 में भवानी प्रसाद मिश्र की एकांकी  'दो कलाकार' का निर्देशन और उस में अभिनय किया | मगर ठोस रूप में यह आरम्भ माना जाना चाहिए वर्ष 1994 से | 21 सितम्बर को स्वदेश दीपक के लिखे नाटक 'कोर्ट मार्शल' के कैप्टन बिकाश राय की भूमिका से यह आरम्भ हुआ | वर्ष 1994 से ही विधिवत नाट्य-लेखन की शुरुआत हुई | तब लिखा गया था---'अजगर की लीक',जिसे बाद में 'पिशाच-लीला' कर दिया गया | वर्ष 1995-96 से जवाहर कला केंद्र,जयपुर द्वारा 'प्रदेश-स्तरीय लघु नाट्य-लेखन प्रतियोगिता' आरम्भ की गयी | तब हमारा लिखा नाटक पहली बार पुरस्कृत हुआ | तब से शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक चला आ रहा है | वर्ष 2000-01,2001-02,2002-03 और 2007-08   में यह प्रतियोगिता हुई नहीं |10 वर्षों तक युवा वर्ग में पुरस्कृत होने के बाद इस बार प्रौढ़ वर्ग में पुरस्कार मिला है | अरे भई,प्रौढ़ से चौंकिए मत | हमारी उम्र कोई इतनी भी नहीं हो गयी है कि प्रौढ़ कहलाएँ;मगर क्या करें,ज.क.केंद्र का नियम ही यह है कि 35 पार होते ही प्रौढ़ वर्ग शुरू | प्रभु-कृपा से इस प्रतियोगिता में लगातार 11 वर्षों तक पुरस्कृत होने वाले के रूप में हमारे नाम प्रदेश के इकलौते नाटककार होने का श्रेय है | तो चलिए,एक नज़र डाल लीजिए ज.क.केंद्र की ओर से मिले इन पुरस्कारों पर---
    वर्ष                                          नाटक                                         पुरस्कार 
 1995-96      पिशाच-लीला ( अजगर की लीक )                                   सांत्वना 
1996-97        काश!!! ( एक थी शिवानी )                                           सांत्वना 
1997-98  यह मौसम रीत चुका है ( उगे हुए अँधेरे झूठ नहीं बोलते )          द्वितीय 
1998-99             अमृतघट                                                               प्रथम
1999-2000      लाल लोई रा छांटा                                                      तृतीय
2003-04       माई री ! मैं का से कहूँ उर्फ़ पीलू                                     सांत्वना
2004-05        उम्र नींद-सी क्यूं नहीं होती                                            द्वितीय
2005-06 इन्द्रनीलमणि उर्फ़ हादसों की बरसियाँ होती हैं,जयन्तियाँ नहीं    सांत्वना
2006-07   ललाटों के तिलक वाशबेसिन में नहीं धोये जाते                      सांत्वना
2008-09    मामेकं शरणं व्रज                                                             तृतीय
               हमारे लिखे नाटकों की एक झलक इस प्रकार है---
                            (अ) हिंदी नाटक 
  (क) मंचीय नाटक:---
 (1) अमानुषी गंध (2) काश !!! (3) पिशाच-लीला (4) यह मौसम रीत चुका है (5)यह है हिन्दुस्तानी नारी (6) अमृतघट (7)माई री ! मैं का से कहूँ उर्फ़ पीलू (8)उम्र नींद-सी क्यों नहीं होती (9)वाह रे देश के कर्णधार ! (10)इन्द्र नील मणि उर्फ़ हादसों की बरसियाँ होती हैं,जयन्तियाँ नहीं (11)ललाटों के तिलक वाशबेसिन में नहीं धोये जाते (12)मामेकं शरणं व्रज (13)खेलें खेल जिनावर का 
 (ख) नुक्कड़ नाटक:---(1)मेरी आवाज़ सुनो (2)सुनो भाई साधो !
 (ग) रेडियो नाटक:---प्रेत बोलते हैं
 (घ) नाट्य-रूपांतरण:---आलम शाह खान की कहानी 'एक और मौत' का 'क्षुधाप्रेत' के नाम से 
                         (आ) (राजस्थानी नाटक) 
 (क)मंचीय नाटक:---
 (1)युद्धं शरणं गच्छामि (2)ऐक ही शिवानी (3)ऊग्योड़ा अंधारा कूड़ नीं बोलै (4)अजगर री लीक (5) लाल लोई रा छांटा  
                        (इ)प्रकाशित पुस्तकें 
(1) तीन नूवां नाटक ( राजस्थानी नाटक-संग्रह )
(2)युद्धं शरणं गच्छामि
(3)अमानुषी गंध
                      (ई)शीघ्र प्रकाश्य पुस्तकें
(1)मौहब्बतों का क़र्ज़ ( ग़ज़ल-नज़्म-संग्रह )
(2)शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त (ग़ज़ल-नज़्म-संग्रह)
                     (उ)अभिनय:---लगभग डेढ़ दर्ज़न नाटकों में 
                     (ऊ)निर्देशन:---छह नाटकों का 
                 हमारे अधिकतर नाटकों का मंचन हो चुका है | हाल ही में पुरस्कृत नाटक 'मामेकं शरणं व्रज' का भी मंचन २७ फ़रवरी को किया गया | उसी अवसर पर हमें ज.क.केंद्र के कार्यक्रम-अधिकारी श्री संदीप र. मदान के हाटों पुरस्कार भी प्रदान किया गया | हमारे एकपत्रीय नाटक  'यह मौसम रीत चुका है' के तो अब तक 21 शो हो चुके हैं | यह नाटक वर्ष 1998  सोलन (हि.प्र.) में अखिल भारतीय नाट्य-प्रतियोगिता 'अभिव्यक्ति-98' में 'सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख' का पुरस्कार प्राप्त कर चुका है |
                 'राजस्थानी भाषा के पहले एकपात्रीय नाटक' का श्रेय हमारे नाटक 'ऊग्योड़ा अंधारा कूड़ नीं बोलै' को प्राप्त है |हमारे लिखे नाटकों में छः नाटक एकपात्रीय हैं | हमें एकपात्रीय नाटकों का का विशेषज्ञ माना जाता है | 
                  मित्रो,समयाभाव के कारण अब नाट्य-जगत में पहले जितनी सक्रियता नहीं रही,मगर लेखन के जरिये अब भी जुड़े हुए हैं | ,,, आज आप से यह चर्चा कर ली | कर के अच्छा लगा | अपनों के साथ ख़ुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं | फिर किसी दिन कुछ अलग मूड होगा तो अपने शायर-कवि और मंच-संचालक के रूप की भी चर्चा करेंगे | ......... आज बस इतना ही | अब आज के आनंद की जय | ............. जय श्री राम |